बल्कि इस एहसास से होती है कि—
“मैंने उसके लिए इतना कुछ बदला,
और वो मेरे लिए एक चीज़ भी नहीं छोड़ सका।”
जब इंसान किसी से प्यार करता है,
तो बड़ी कुर्बानियाँ नहीं,
छोटी-छोटी कोशिशें मायने रखती हैं।
क्योंकि एक आदत छोड़ना सिर्फ आदत छोड़ना नहीं होता,
वो ये कहना होता है—
“तुम मेरी ज़िद से ज़्यादा ज़रूरी हो।”
और जब सामने वाला हर बार अपनी पसंद,
अपना शौक, अपनी आदत को ही चुनता रहे,
तो धीरे-धीरे रिश्ते में सवाल पैदा होते हैं—
“क्या मेरी नापसंद की इतनी भी अहमियत नहीं?”
रिश्ते सिर्फ निभाने से नहीं चलते,
एक-दूसरे की असुविधा समझने से चलते हैं।
सुगम
No comments:
Post a Comment
Please do not enter any spam link in the comment box.