राह के दो किनारे जैसे
कभी मिल एक नहीं होते,
अगर हो जाऐं तो
वो रास्ते खत्म हो
जाया करते हैं,
इस लिए तो जिंदगी
शांति नहीं, सांचे में
पूरी ढलती ही कहाँ है,
सांचे से बाहर निकल
उबाल मारे बगैर
रह ही नहीं सकती,
कभी ना खत्म होती राह है,
खुशी - गमी, पास - दूर
आगे- पीछे, हर वक़्त
वक्त मूझे खींचता है
और मैं वक़्त की निशानीयां,
खीचा तानी लगी ही हुई है,
मगर कभी जिंदगी
सुलह नहीं करेगी,
पता है? जहाँ सुलह हुई
वो वक्त, वो राह
आखरी होगी,
सांस आखिरी
किनारे पर बैठी होगी,
सुगम बडियाल✨
Note ; It's my hindi translated poetry, my Original poetry written in Punjabi
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