चल पड़ता हूँ
फिर रोज़ उसी दिशा में
यहाँ की बातें
परेशानी देती हैं,
ठंडी सील पे
जैसे सुला देती है
कोई फिक्र फिर से
रुला देती है,
आंसू पौंच, पर
फिर वहीं लोट जाने की
सलाह दी जाती है,
रोज़ जिंदगी के नाम पे
कोई बड़ी सी बात
सुना दी जाती है,
रोज़ एक नई बात
लोगों को देख
समझ आती है
जल्दी जल्दी में
फिर जिंदगी के
सबक वाली बात
थैले में रख
भूला दी जाती है,
बैल की तरह
रोज़ जोता जाता हूँ
मजबूरी के सामने
घुटनों के बल
चला जाता हूँ मैं,
जिंदगी! जिंदगी!
और जिंदगी...
ऐसे ही चलती है,
लफ्ज़ सुनते सुनाते
समय बिताता हूँ मैं,
सुगम बडियाल
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