अभी बहुत दर्द बाकी है
अभी से रोने लगे तो
दर्द को छुपायेंगे कैसे,
मौसमी तुफान है
हम भी देखेंगे,
मातम का पहरा वो
अभी से हमारे नाम पर
बिठायेंगे कैसे?
आजकल फिज़ाओं में
मायूसीयत कुछ ज्यादा है,
कोई बात नहीं!
हमें भी इन्हें धोखा देने में
आजकल मज़ा आ रहा है,
काले रंग में एक
सकून रहता है,
कोई डराने आये
तो अंधेरों में डरेंगे कैसे?
अक्सर ये जगमग करते दिन
ही हमें डरा देते हैं
अंधेरी यादों में इतना हर कहाँ?
सुगम बडियाल🌼
अभी से रोने लगे तो
दर्द को छुपायेंगे कैसे,
मौसमी तुफान है
हम भी देखेंगे,
मातम का पहरा वो
अभी से हमारे नाम पर
बिठायेंगे कैसे?
आजकल फिज़ाओं में
मायूसीयत कुछ ज्यादा है,
कोई बात नहीं!
हमें भी इन्हें धोखा देने में
आजकल मज़ा आ रहा है,
काले रंग में एक
सकून रहता है,
कोई डराने आये
तो अंधेरों में डरेंगे कैसे?
अक्सर ये जगमग करते दिन
ही हमें डरा देते हैं
अंधेरी यादों में इतना हर कहाँ?
सुगम बडियाल🌼
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