सबसे ख़तरनाक ख़ंजर नहीं होता,
जो सीने पर वार कर जाए,
ज़ख़्म तो दिख जाते हैं उसके,
लोग मरहम भी लगा जाएँ।
सबसे ख़तरनाक वह भी नहीं,
जो खुलकर दुश्मनी निभाता है,
कम-से-कम उसका चेहरा तो
पहचाना हुआ नज़र आता है।
सबसे ख़तरनाक वह इंसान है,
जो कानों में भँवरों-सा गुनगुनाता है,
हर बात में अपना शहद मिलाकर
दूसरों के दिलों में ज़हर पहुँचाता है।
चेहरे पर मुस्कान सजाए रखता,
बातों में मिठास घोलता है,
और जब रिश्ते बिखर जाते हैं,
तो सबसे पहले अफ़सोस भी वही बोलता है।
व्यंग्य यह है कि ऐसे लोग
अक्सर समझदार कहलाते हैं,
आग किसी और के घर लगाकर
ख़ुद तमाशबीन बन जाते हैं।

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